Thursday, January 7, 2010

आँखों भर आकाश / निदा फ़ाज़ली

मन बैरागी, तन अनुरागी, कदम-कदम दुशवारी है

जीवन जीना सहल न जानो बहुत बड़ी फनकारी है

औरों जैसे होकर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में

कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है

जब-जब मौसम झूमा हम ने कपड़े फाड़े शोर किया

हर मौसम शाइस्ता रहना कोरी दुनियादारी है

ऐब नहीं है उसमें कोई, लाल परी न फूल गली

यह मत पूछो, वह अच्छा है या अच्छी नादारी

जो चेहरा देखा वह तोड़ा, नगर-नगर वीरान किए

पहले औरों से नाखुश थे अब खुद से बेज़ारी है।

No comments:

Post a Comment