Tuesday, January 12, 2010

दुष्यंत कुमार

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता

एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

रौशन हुए चराग़ तो आँखें नहीं रहीं

अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता

हम घर में भटके हैं कैसे ठौर—ठिकाने आएँगे

हो गई है पीर —पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

पत्तों से चाहते हो बजें साज़ की तरह

पेड़ों से पहले आप उदासी तो लीजिए

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है

चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

यहाँ तक आते—आते सूख जाती हैं कई नदियाँ

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

मौत ने तो धर दबोचा एक चीते की तरह

ज़िन्दगी ने जब छुआ कुछ फ़ासला रख कर छुआ

मत कहो आकाश में कुहरा घना है

यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है

मैं भी तो अपनी बात लिखूँ अपने हाथ से

मेरे सफ़े पे छोड़ दे थोड़ा—सा हाशिया

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